उत्तराखंड की महिलाओं ने पेश की मिसाल, आईटीबीपी को सीधे सप्लाई कर रहीं ऑर्गेनिक सब्जियां..
उत्तराखंड: देहरादून जिले के सहसपुर विकासखंड में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने का काम कर रही हैं। जिला प्रशासन, उद्यान विभाग और ग्रामोत्थान (रीप) परियोजना के सहयोग से शुरू की गई पहल के तहत अब स्थानीय किसानों की ऑर्गेनिक सब्जियां सीधे भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) तक पहुंचाई जा रही हैं। इस व्यवस्था से जहां किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल रहा है, वहीं महिलाओं के लिए भी गांव में ही रोजगार और आय के नए अवसर पैदा हुए हैं। सहसपुर ब्लॉक के आमवाला स्थित कोटरा संतूर क्षेत्र की महिलाएं आसपास के गांवों से किसानों द्वारा उगाई गई ताजी और जैविक सब्जियों का संग्रह करती हैं। इसके बाद इन्हें सीमाद्वार स्थित आईटीबीपी परिसर में भेजा जाता है। किसानों से सीधे खरीद और संस्थागत आपूर्ति की इस व्यवस्था ने बिचौलियों की भूमिका को काफी हद तक कम कर दिया है, जिससे उत्पादकों को उचित कीमत मिलने लगी है।
इस पहल का संचालन स्वयं सहायता समूहों से जुड़े ‘उड़ान क्लस्टर लेवल फेडरेशन’ के माध्यम से किया जा रहा है। समूह की महिलाएं हर 15 दिन के अंतराल पर आईटीबीपी को ऑर्गेनिक सब्जियों की आपूर्ति कर रही हैं। वर्तमान में यह आपूर्ति आईटीबीपी की कुल सब्जी आवश्यकता का लगभग 25 प्रतिशत पूरा कर रही है। अप्रैल से जुलाई के बीच अब तक पांच चरणों में 1,344 किलोग्राम (करीब 13 क्विंटल) से अधिक ऑर्गेनिक सब्जियां आईटीबीपी को उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। आपूर्ति का क्रम लगातार बढ़ रहा है। अब तक 29 अप्रैल को 317 किलोग्राम, 11 मई को 181 किलोग्राम, 29 मई को 209 किलोग्राम, 12 जून को 306 किलोग्राम और 2 जुलाई को 328 किलोग्राम सब्जियां भेजी गईं।
अधिकारियों के अनुसार इस व्यवस्था के माध्यम से अब तक एक लाख रुपये से अधिक मूल्य की सब्जियों की आपूर्ति की जा चुकी है। अनुबंध के तहत सब्जियों के दाम एक वर्ष के लिए तय किए गए हैं, जिससे किसानों और महिलाओं दोनों को मूल्य को लेकर अनिश्चितता का सामना नहीं करना पड़ता। परियोजना से जुड़ी महिलाओं को प्रत्येक आपूर्ति पर लगभग 1,000 से 2,000 रुपये तक की बचत और अतिरिक्त आय हो रही है। ऑर्गेनिक उत्पादों की गुणवत्ता को देखते हुए आने वाले समय में आईटीबीपी की मांग में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि होने की संभावना जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो इस मॉडल का विस्तार विकासनगर, लांघा और डोईवाला जैसे क्षेत्रों तक भी किया जा सकता है, जिससे और अधिक किसान एवं महिला समूह इससे जुड़ सकेंगे।
प्रशासन का मानना है कि यह मॉडल ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ स्थानीय कृषि को भी नई मजबूती दे रहा है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि इस पहल का दायरा बढ़ाकर अधिक से अधिक स्वयं सहायता समूहों को इससे जोड़ा जाए, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार और आय के नए अवसर विकसित किए जा सकें। ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह पहल उत्तराखंड में सामुदायिक भागीदारी आधारित आर्थिक मॉडल का एक सफल उदाहरण बनकर उभर रही है, जहां किसान, महिलाएं और सरकारी संस्थाएं मिलकर स्थानीय विकास को नई गति दे रहे हैं।

