उत्तराखंड में पलायन का असर कितना? जनगणना बताएगी खाली हो चुके गांवों की संख्या..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में लंबे समय से पलायन एक बड़ी सामाजिक और विकासात्मक चुनौती बना हुआ है। पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के कारण कई गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं, जिन्हें आमतौर पर ‘घोस्ट विलेज’ कहा जाता है। अब प्रदेश में 25 अप्रैल से शुरू होने वाली जनगणना प्रक्रिया के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि पिछले वर्षों में ऐसे खाली हो चुके गांवों की संख्या में कितना इजाफा हुआ है और पलायन की वास्तविक स्थिति क्या है। जनगणना निदेशालय ने इस बार प्रदेश के सभी गांवों की विस्तृत गणना करने का निर्णय लिया है। इसके तहत हर गांव में जाकर आंकड़े जुटाए जाएंगे, जिससे यह पता लगाया जा सके कि किन क्षेत्रों में आबादी कम हुई है, कहां लोग पूरी तरह पलायन कर चुके हैं और किन स्थानों पर रिवर्स पलायन की स्थिति बनी है।
पिछली जनगणना वर्ष 2011 में हुई थी। उस समय उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में कुल 16,793 गांव दर्ज किए गए थे। इनमें से 1,048 गांव ऐसे थे जो पलायन के कारण पूरी तरह खाली हो चुके थे। पिछले डेढ़ दशक में राज्य में विकास, सड़क, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों को लेकर कई योजनाएं शुरू की गई हैं। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन प्रयासों का असर कितना पड़ा और क्या वास्तव में पहाड़ों से पलायन की रफ्तार कम हुई है। राज्य में पलायन को गंभीर मुद्दा मानते हुए सरकार ने पलायन आयोग का गठन भी किया था। आयोग का उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्रों से हो रहे पलायन को रोकना और रिवर्स पलायन को बढ़ावा देना है। इसके तहत गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाने, बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में बदलाव देखने को मिला है, लेकिन वास्तविक स्थिति का सही आकलन जनगणना के आंकड़ों से ही सामने आ पाएगा।
जनगणना निदेशालय के अधिकारियों के अनुसार इस बार की प्रक्रिया को दो चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में 25 अप्रैल से 24 मई तक भवन गणना और मकान सूचीकरण का कार्य किया जाएगा। इस दौरान हर गांव में जाकर मकानों, भवनों और वहां रहने वाले लोगों से जुड़ी प्रारंभिक जानकारी एकत्र की जाएगी। इसके बाद दूसरे चरण में अगले वर्ष 9 फरवरी से 28 फरवरी के बीच जनगणना का मुख्य कार्य किया जाएगा, जिसमें आबादी से जुड़े विस्तृत आंकड़े जुटाए जाएंगे। इस पूरी प्रक्रिया के बाद राज्य में आबादी के वितरण, पलायन और गांवों की स्थिति से जुड़ी स्पष्ट तस्वीर सामने आने की उम्मीद है। जनगणना की तैयारियों के तहत प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू किए जा रहे हैं। इसी क्रम में 9 मार्च से देहरादून में मास्टर ट्रेनरों का प्रशिक्षण आयोजित किया जा रहा है। इन मास्टर ट्रेनरों को मकान सूचीकरण, भवन गणना और डेटा एकत्र करने की प्रक्रिया से जुड़ी सभी तकनीकी और प्रशासनिक जानकारियां दी जाएंगी।
प्रशिक्षण के दौरान उन्हें यह भी बताया जाएगा कि मोबाइल एप और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से किस प्रकार सटीक और सुरक्षित तरीके से आंकड़ों की एंट्री की जाएगी। इसके अलावा जनगणना के दौरान किन सावधानियों का पालन करना है और किस प्रकार लोगों से जानकारी जुटानी है, इसकी भी विस्तृत जानकारी दी जाएगी। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद यही मास्टर ट्रेनर प्रदेश के विभिन्न जिलों और क्षेत्रों में जाकर स्थानीय कर्मचारियों और गणनाकारों को प्रशिक्षण देंगे। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जनगणना का कार्य पूरे राज्य में एक समान प्रक्रिया और सटीकता के साथ संपन्न हो सके। राज्य में होने वाली इस जनगणना से न केवल आबादी के ताजा आंकड़े सामने आएंगे, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन और खाली हो चुके गांवों की वास्तविक स्थिति का भी पता चल सकेगा। इसके आधार पर सरकार भविष्य में विकास योजनाओं और नीतियों को और अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में कदम उठा सकेगी।


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