June 15, 2026
उत्तराखंड

विश्व धरोहर फूलों की घाटी में उमड़ रहे पर्यटक, इस बार टूटा पिछले साल का रिकॉर्ड..

विश्व धरोहर फूलों की घाटी में उमड़ रहे पर्यटक, इस बार टूटा पिछले साल का रिकॉर्ड..

 

उत्तराखंड: चमोली जनपद स्थित विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी इन दिनों अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित कर रही है। मानसून की दस्तक के साथ ही घाटी में विभिन्न प्रजातियों के रंग-बिरंगे फूल खिलने शुरू हो गए हैं, जिससे पूरा क्षेत्र प्राकृतिक रंगों की अद्भुत चादर में लिपटा नजर आ रहा है। घाटी खुलने के बाद से बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं और प्रकृति के इस अनोखे नजारे का आनंद ले रहे हैं। इस वर्ष अब तक हजारों भारतीय पर्यटक फूलों की घाटी का भ्रमण कर चुके हैं, जबकि विदेशी पर्यटकों की आवाजाही भी शुरू हो गई है। वर्तमान में घाटी में 20 से अधिक प्रजातियों के फूल खिले हुए हैं, जिनकी सुंदरता पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर रही है। हर वर्ष जून से अक्टूबर तक खुलने वाली यह घाटी हिमालयी जैव विविधता और प्राकृतिक धरोहर का अनमोल उदाहरण मानी जाती है।

हर पंद्रह दिन में बदल जाता है घाटी का रंग

फूलों की घाटी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मौसम के साथ फूलों की प्रजातियां बदलती रहती हैं। लगभग हर पंद्रह दिनों के अंतराल पर नए फूल खिलते हैं और घाटी का रंग-रूप भी बदल जाता है। यही कारण है कि एक ही सीजन में अलग-अलग समय पर आने वाले पर्यटकों को घाटी का अलग स्वरूप देखने को मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार घाटी में लगभग 500 से अधिक प्रजातियों के पुष्प पाए जाते हैं। इनमें कई दुर्लभ और औषधीय महत्व वाली वनस्पतियां भी शामिल हैं। इन दिनों प्रिम्युला, कोबरा लिली, आइरिस, रोडोडेंड्रोन, थाइमस, वायोला, लिलियम, थर्मोप्सिस और अर्नेबिया जैसी कई आकर्षक प्रजातियां पर्यटकों का ध्यान खींच रही हैं।

फूलों की घाटी केवल पुष्पों के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यह दुर्लभ वन्यजीवों का भी महत्वपूर्ण आवास है। यहां हिमालयन थार, कस्तूरी मृग, हिम तेंदुआ और कई अन्य दुर्लभ जीव-जंतु पाए जाते हैं। घाटी का पूरा क्षेत्र उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है, जहां प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है। करीब 87.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह घाटी वर्ष के अधिकांश समय बर्फ से ढकी रहती है। शीतकाल के दौरान यहां भारी हिमपात होता है, जबकि गर्मियों और मानसून के मौसम में यह क्षेत्र हजारों रंग-बिरंगे फूलों से भर जाता है। फूलों की घाटी तक पहुंचने का सफर भी किसी रोमांच से कम नहीं है। बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित गोविंदघाट से पुलना होते हुए लगभग 10 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर घांघरिया पहुंचा जाता है। इसके बाद लगभग तीन किलोमीटर की अतिरिक्त पैदल दूरी तय कर पर्यटक फूलों की घाटी तक पहुंचते हैं। घाटी में पर्यटकों को केवल दिन के समय ही प्रवेश की अनुमति होती है और शाम तक वापस लौटना अनिवार्य है। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए यहां रात्रि विश्राम की अनुमति नहीं है। घाटी के भीतर खानपान की दुकानें भी नहीं हैं, इसलिए पर्यटकों को आवश्यक सामग्री अपने साथ ले जानी पड़ती है।

बढ़ रही पर्यटकों की संख्या

इस वर्ष घाटी खुलने के बाद पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। राष्ट्रीय उद्यान प्रशासन के अनुसार अब तक 2698 भारतीय और 12 विदेशी पर्यटक घाटी का भ्रमण कर चुके हैं। इससे पार्क प्रशासन को लगभग 4.90 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ है। पिछले वर्ष इसी अवधि में पर्यटकों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी, जिससे साफ है कि इस बार लोगों का रुझान अधिक बढ़ा है। फूलों की घाटी को वैश्विक पहचान दिलाने का श्रेय ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक स्माइथ को जाता है। वर्ष 1931 में कामेट पर्वत अभियान से लौटते समय वे संयोगवश इस घाटी तक पहुंचे थे। घाटी की अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता और फूलों की विविधता से प्रभावित होकर उन्होंने बाद में इस क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन किया। वर्ष 1938 में उनकी पुस्तक “वैली ऑफ फ्लावर्स” प्रकाशित हुई, जिसके बाद यह अनजान घाटी विश्वभर के प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों के बीच प्रसिद्ध हो गई। बाद में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया और वर्ष 2005 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्रदान किया। हिमालय की गोद में बसी फूलों की घाटी आज भी प्रकृति प्रेमियों, ट्रैकर्स, फोटोग्राफरों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। रंग-बिरंगे फूलों, दुर्लभ वनस्पतियों, स्वच्छ वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य के कारण यह स्थान उत्तराखंड पर्यटन की सबसे अनमोल धरोहरों में गिना जाता है। मानसून के आगे बढ़ने के साथ आने वाले हफ्तों में घाटी और अधिक रंगीन होने की संभावना है, जिससे पर्यटकों की संख्या में भी तेजी से बढ़ोतरी होने की उम्मीद जताई जा रही है।

 

 

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