थोल मेले में कंडार देवता की भव्य हाथी रथयात्रा, नगरभर गूंजे जयकारे और लोकनृत्य..
उत्तराखंड: बाड़ाहाट के थोलू महोत्सव के अवसर पर बाड़ाहाट के राजा एवं आराध्य देव कंडार देवता की भव्य हाथी रथयात्रा का आयोजन किया गया। ढोल-दमाऊ और रणसिंगे की तान पर पांडव पश्वों की अगुवाई में नगर क्षेत्र के विभिन्न मार्गों से गुजरती यह यात्रा श्रद्धालुओं के लिए अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रही थी। इस अवसर पर स्थानीय ग्रामीण रासो-तांदी लोकनृत्य में जमकर थिरके और सैकड़ों लोगों ने कंडार देवता का आशीर्वाद प्राप्त किया। कंडार देवता को बाड़ाहाट का राजा और न्याय का देवता माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जहां पंडित की पोथी, डॉक्टर की दवा या कोतवाल का डंडा असफल हो जाता है, वहां कंडार देवता की शक्ति कारगर होती है। यही कारण है कि नगरवासी और क्षेत्र के लोग वास्तु दोष, बीमारी या किसी भी प्रकार की विपत्ति में उनकी शरण लेते हैं।
दूसरे दिन की मुख्य घटना और रथयात्रा का मार्ग..
थोलू महोत्सव के दूसरे दिन बाड़ाहाट क्षेत्र के पाटा, संग्राली, बग्याल, लक्षेश्वर और आसपास के गांवों से लोग चमाला की चौरी में एकत्रित हुए। यहां कंडार देवता के लिए प्रतिमात्मक हाथी की लकड़ी से बनी मूर्ति तैयार की गई। ढोल-दमाऊ और रणसिंगे की धुनों पर पांडव पश्वों ने चमाला की चौरी की धुंयाल से विशेष पूजा-अर्चना के बाद देवता की मूर्ति को हाथी के रथ पर सवार किया। रथ यात्रा का मार्ग भैरव चौक से काशी विश्वनाथ चौक, मुख्य बाजार होते हुए मणिकर्णिका घाट तक रहा। इस दौरान मां गंगा की विशेष पूजा-अर्चना की गई और स्थानीय महिलाएं व श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में विभिन्न चौक और मार्गों पर रासो-तांदी लोकनृत्य प्रस्तुत करते रहे। बाड़ाहाट के आराध्य कंडार देवता को न केवल राजा और न्यायदाता माना जाता है, बल्कि उन्हें उत्तरकाशी का कोतवाल और क्षेत्राधिपति भी माना जाता है। उनकी शक्ति और चमत्कारी प्रभाव के कारण विवाह, मुंडन, जन्म कुंडली मिलान और अन्य धार्मिक एवं सामाजिक निर्णयों के लिए भी लोग उनकी शरण में आते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि कंडार देवता के बताए नियम और शुभ दिन अनुसार किए गए कार्यों से वास्तु दोष, बीमारी और दैवीय प्रकोप जैसी समस्याओं का समाधान संभव है। यही कारण है कि हर वर्ष थोलू महोत्सव में उनकी रथयात्रा को अत्यधिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों की आस्था का उत्सव..
हाथी रथयात्रा के दौरान नगर के हर चौक और मार्ग श्रद्धालुओं और ग्रामीणों से गुलजार रहे। फूलों की वर्षा, ढोल-दमाऊ की थाप और रासो-तांदी लोकनृत्य ने इस आयोजन को धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भव्य बना दिया। थोलू महोत्सव केवल कंडार देवता की आराधना का अवसर नहीं है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक एकता को जीवित रखने का प्रतीक भी है। इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बाड़ाहाट की धरती पर आस्था, परंपरा और सामूहिक उत्साह सदियों से जीवंत हैं।


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