नैनीताल की पहाड़ियों में मिले पौधे पर अंतरराष्ट्रीय जर्नल में रिसर्च प्रकाशित..
एंटीऑक्सीडेंट गुणों का विश्लेषण..
उत्तराखंड: उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली औषधीय वनस्पतियां वैज्ञानिक शोध के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हो रही हैं। इसी क्रम में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर के शोधकर्ताओं ने नैनीताल जिले के भवाली क्षेत्र में मिलने वाले एक पौधे इसोडोन कोएस्टा (Isodon coesta) का अध्ययन किया है। शोध में इस पौधे के अर्क में एंटीऑक्सीडेंट गुणों से जुड़े रासायनिक तत्वों की मौजूदगी सामने आई है। साथ ही, इसके कुछ घटकों में सूजन कम करने की संभावनाओं का भी विश्लेषण किया गया है। हालांकि, यह शुरुआती स्तर का अध्ययन है और इसके आधार पर पौधे को किसी बीमारी के इलाज में प्रभावी मानना अभी उचित नहीं होगा। शोध से उत्तराखंड की स्थानीय वनस्पतियों में मौजूद संभावित औषधीय गुणों को समझने का एक नया रास्ता खुला है। वैज्ञानिकों ने पौधे के अलग-अलग अर्क का परीक्षण कर उनमें मौजूद रासायनिक यौगिकों और उनकी एंटीऑक्सीडेंट क्षमता का आकलन किया। अध्ययन की रिपोर्ट 3 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Discover Chemistry में प्रकाशित हुई।
भवाली की पहाड़ियों से जुटाया गया था पौधे का नमूना
शोध के लिए इसोडोन कोएस्टा का नमूना नैनीताल जिले के भवाली क्षेत्र से एकत्र किया गया था। यह पौधा समुद्र तल से लगभग 1,654 मीटर की ऊंचाई पर मिला। विश्वविद्यालय के वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. डीएस रावत ने इसकी पहचान की। शोध में इस्तेमाल किए गए पौधे का नमूना विश्वविद्यालय के हर्बेरियम में GBPUH-1615 संख्या के तहत संरक्षित रखा गया है। इस अध्ययन में देवकी मावड़ी, रोहित पुजारी, अनन्या बहुगुणा, धर्मेंद्र सिंह रावत, ओम प्रकाश, रवींद्र कुमार और शिव कुमार दुबे शामिल रहे। शोधकर्ताओं ने पौधे की रासायनिक संरचना का अध्ययन करने के साथ यह भी जानने की कोशिश की कि इसके अलग-अलग अर्क में कौन से तत्व मौजूद हैं और उनकी संभावित जैविक गतिविधियां क्या हो सकती हैं।
क्या है इसोडोन कोएस्टा पौधा?
इसोडोन कोएस्टा एक सुगंधित और बहुवर्षीय वनस्पति है, जिसकी ऊंचाई लगभग आधा मीटर से ढाई मीटर तक हो सकती है। इसके फूल बैंगनी या नीले-बैंगनी रंग के होते हैं और छोटे-छोटे गुच्छों में खिलते हैं। सामान्यतः इसमें अक्टूबर से फरवरी के बीच फूल दिखाई देते हैं। इसकी पत्तियों को मसलने पर तेज हर्बल खुशबू आती है, जो तुलसी या पुदीने की सुगंध जैसी महसूस हो सकती है। यह पौधा लैमिएसी यानी तुलसी परिवार से संबंधित है। भारत के अलावा नेपाल, चीन, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका और थाईलैंड में भी इसकी मौजूदगी बताई जाती है। स्थानीय स्तर पर इस तरह की वनस्पतियों का महत्व केवल उनकी प्राकृतिक विविधता तक सीमित नहीं है। इनके भीतर मौजूद रासायनिक यौगिकों की पहचान भविष्य में औषधीय अनुसंधान के लिए उपयोगी आधार तैयार कर सकती है।
दो तरह के अर्क तैयार कर किया गया परीक्षण
शोधकर्ताओं ने पौधे की जड़ों को छोड़कर अन्य हिस्सों को सुखाया और उनका पाउडर तैयार किया। इसके बाद दो अलग-अलग विलायकों की मदद से अर्क निकाले गए। इनमें मेथनॉल अर्क और हेक्सेन अर्क शामिल थे। मेथनॉल अर्क तैयार करने के लिए 187.61 ग्राम सूखे पौधे का इस्तेमाल किया गया, जबकि हेक्सेन अर्क के लिए 151.27 ग्राम सामग्री ली गई। पौधे के हिस्सों को संबंधित विलायक में 10 से 15 दिनों तक रखा गया। इसके बाद प्राप्त अर्क की मात्रा और रासायनिक विशेषताओं का विश्लेषण किया गया। शोध में मेथनॉल से लगभग 4.02 प्रतिशत अर्क प्राप्त हुआ, जबकि हेक्सेन से 1.10 प्रतिशत अर्क मिला। दोनों अर्क की तुलना में मेथनॉल अर्क में फेनोलिक और फ्लेवोनॉयड यौगिकों की मात्रा अधिक पाई गई। ये यौगिक कई पौधों में पाए जाने वाले प्राकृतिक रसायन हैं, जिनका एंटीऑक्सीडेंट गतिविधियों के संदर्भ में अध्ययन किया जाता है।
मेथनॉल अर्क में ज्यादा मिले फेनोलिक और फ्लेवोनॉयड तत्व
अध्ययन में मेथनॉल अर्क के भीतर फेनोलिक तत्वों की मात्रा 31.37 मिलीग्राम प्रति ग्राम और फ्लेवोनॉयड की मात्रा 313.28 मिलीग्राम प्रति ग्राम दर्ज की गई। वहीं, हेक्सेन अर्क में फेनोलिक तत्व 17.19 मिलीग्राम प्रति ग्राम और फ्लेवोनॉयड 117.57 मिलीग्राम प्रति ग्राम पाए गए। एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि से संबंधित परीक्षण में भी मेथनॉल अर्क ने हेक्सेन अर्क की तुलना में बेहतर परिणाम दिखाए। रिपोर्ट में मेथनॉल अर्क के लिए 8.61 मिलीग्राम प्रति ग्राम और हेक्सेन अर्क के लिए 2.07 मिलीग्राम प्रति ग्राम का मान दिया गया है। एंटीऑक्सीडेंट वे पदार्थ होते हैं, जो कुछ परिस्थितियों में शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले फ्री रेडिकल्स के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, किसी पौधे के अर्क में एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसका सेवन करने से किसी बीमारी का इलाज हो सकता है। इसके लिए अलग और अधिक व्यापक वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी होते हैं।
पौधे में पहचाने गए 48 रासायनिक यौगिक
शोध के दौरान गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री (GC-MS) तकनीक की मदद से पौधे के अर्क में मौजूद रासायनिक घटकों की पहचान की गई। इस विश्लेषण में कुल 48 रासायनिक यौगिकों की पहचान की गई। इनमें से 24 मेथनॉल अर्क और 24 हेक्सेन अर्क में पाए गए। इस तकनीक के जरिए किसी नमूने में मौजूद विभिन्न रासायनिक यौगिकों की पहचान करने में मदद मिलती है। शोधकर्ताओं ने इसके साथ DPPH परीक्षण भी किया, जिसका इस्तेमाल प्रयोगशाला में किसी पदार्थ की फ्री रेडिकल्स को निष्क्रिय करने की क्षमता का आकलन करने के लिए किया जाता है। रिपोर्ट में आणविक स्तर पर संभावित अंतःक्रियाओं और ADMET विश्लेषण का भी उल्लेख है। ADMET अध्ययन के जरिए किसी यौगिक के शरीर में अवशोषण, वितरण, चयापचय, उत्सर्जन और संभावित विषाक्तता से जुड़े पहलुओं का अनुमान लगाने की कोशिश की जाती है। हालांकि, ऐसे कंप्यूटेशनल विश्लेषण अपने आप में किसी यौगिक की सुरक्षा या चिकित्सकीय प्रभावशीलता का अंतिम प्रमाण नहीं होते।
सूजन कम करने की संभावना, लेकिन दवा बनने में लगेगा समय
विश्वविद्यालय के वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. डीएस रावत के अनुसार, इसोडोन कोएस्टा में ऐसे रासायनिक तत्व मिले हैं, जिनकी एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि और सूजन कम करने की संभावनाओं के लिहाज से आगे जांच की जा सकती है। खास तौर पर मेथनॉल अर्क में कुछ महत्वपूर्ण यौगिकों की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक पाई गई। फिर भी, इन निष्कर्षों को शुरुआती वैज्ञानिक संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए। पौधे के किसी अर्क को दवा के रूप में विकसित करने से पहले उसकी प्रभावशीलता, सही खुराक, संभावित दुष्प्रभाव और सुरक्षा का विस्तृत मूल्यांकन जरूरी होता है। इसके लिए आगे प्रयोगशाला परीक्षण, उपयुक्त जीवों पर प्रायोगिक अध्ययन और आवश्यक नियामकीय मंजूरी के बाद मानव क्लिनिकल परीक्षण जैसी प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ सकती है। इन चरणों के बिना यह तय नहीं किया जा सकता कि पौधे का कोई घटक मनुष्यों में सुरक्षित और प्रभावी उपचार उपलब्ध करा सकता है या नहीं।
औषधीय वनस्पतियों पर शोध से खुल सकती हैं नई संभावनाएं
उत्तराखंड की जैव विविधता में अनेक ऐसी वनस्पतियां मौजूद हैं, जिनके रासायनिक गुणों और संभावित उपयोगों पर आगे शोध किया जा सकता है। इसोडोन कोएस्टा पर किया गया अध्ययन भी इसी दिशा में एक शुरुआती प्रयास है। शोध के निष्कर्ष भविष्य में इस पौधे के रासायनिक घटकों को समझने और उनकी संभावित जैविक गतिविधियों पर अधिक विस्तृत अध्ययन करने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, आम लोगों को इस पौधे या इसके अर्क का इस्तेमाल स्वयं दवा के रूप में नहीं करना चाहिए। वैज्ञानिक पुष्टि और सुरक्षा संबंधी पर्याप्त प्रमाण मिलने तक इसे संभावित औषधीय गुणों वाला पौधा मानना ही उचित होगा।

