ग्लेशियरों के खतरे से पहले मिलेगा अलर्ट, नीती घाटी में वैज्ञानिक लगाएंगे निगरानी सिस्टम..
उत्तराखंड: उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्र नीती घाटी में ग्लेशियर और हिमखंड प्रभावित इलाकों को लेकर प्रशासन ने निगरानी बढ़ा दी है। संभावित आपदा के लिहाज से संवेदनशील स्थानों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के लिए वैज्ञानिकों की एक टीम बृहस्पतिवार को क्षेत्र के लिए रवाना हुई। वैज्ञानिक दल ने सीमांत क्षेत्र में प्रवेश के लिए प्रशासन से जरूरी इनर लाइन अनुमति लेने के बाद अपनी यात्रा शुरू की। टीम का मुख्य उद्देश्य नीती घाटी के उन इलाकों को चिह्नित करना और वहां निगरानी प्रणाली स्थापित करना है, जहां ग्लेशियरों या हिमखंडों से भविष्य में खतरा पैदा हो सकता है।
संवेदनशील क्षेत्रों में बढ़ाई जा रही निगरानी
पिछले महीने नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा के बाद हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर और हिमखंडों से जुड़े संभावित खतरों को लेकर सतर्कता बढ़ाई गई है। इसी क्रम में उत्तराखंड के सीमांत और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भी संवेदनशील स्थानों की पहचान कर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। नीती घाटी भौगोलिक और मौसम की दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यहां ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियरों की मौजूदगी के कारण मौसम में होने वाले बदलाव और बर्फ से जुड़ी घटनाओं पर लगातार नजर रखना जरूरी है।
वैज्ञानिक उपकरणों से मिलेगी समय पर जानकारी
प्रशासन की ओर से संभावित दुर्घटना वाले क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस तकनीकी व्यवस्था का उद्देश्य किसी संभावित खतरे के संकेत मिलने पर समय रहते संबंधित विभागों को सूचना उपलब्ध कराना है, जिससे बचाव और राहत से जुड़ी तैयारियां पहले से की जा सकें।एसडीएम चंद्रशेखर वशिष्ठ ने बताया कि वैज्ञानिकों का दल नीती घाटी में चिन्हित स्थानों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करेगा। टीम के साथ प्रशासन और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी भी मौजूद रहेंगे। वैज्ञानिकों की टीम के साथ विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी भी क्षेत्र में जाएंगे। संयुक्त टीम संवेदनशील स्थानों का निरीक्षण करने के साथ वहां जरूरी तकनीकी व्यवस्था स्थापित करने का काम करेगी। अर्ली वार्निंग सिस्टम के स्थापित होने के बाद ग्लेशियर और हिमखंड प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी को और मजबूत करने में मदद मिलेगी। साथ ही संभावित आपदा की स्थिति में प्रशासन को समय रहते जरूरी कदम उठाने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकेगी। सीमांत क्षेत्रों में इस तरह की तकनीकी निगरानी को मजबूत करना स्थानीय आबादी के साथ-साथ वहां तैनात सुरक्षा और प्रशासनिक एजेंसियों के लिए भी अहम माना जा रहा है।

