पॉलीहाउस योजना को तगड़ा झटका, दो साल बाद भी लक्ष्य से कोसों दूर विभाग..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में किसानों की आय बढ़ाने और बेमौसमी सब्जियों तथा फूलों की खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई महत्वाकांक्षी पॉलीहाउस योजना अब तक अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाई है। करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली यह योजना वर्षों बाद भी पूरी तरह जमीन पर उतरती नजर नहीं आ रही है। स्थिति यह है कि योजना शुरू होने के करीब दो साल बाद भी विभाग हजारों पॉलीहाउस स्थापित करने के लक्ष्य से काफी पीछे है और अभी तक प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा प्रशासनिक औपचारिकताओं में ही उलझा हुआ है।
राज्य में इस योजना के तहत किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने और उन्हें बेमौसमी सब्जियों तथा फूलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने की योजना बनाई गई थी। वर्ष 2023 में सरकार ने इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए व्यापक स्तर पर काम शुरू किया था और प्रदेश भर में करीब 22 हजार पॉलीहाउस स्थापित करने का लक्ष्य तय किया गया था। योजना का उद्देश्य था कि पर्वतीय क्षेत्रों के किसान नियंत्रित वातावरण में उच्च गुणवत्ता वाली सब्जियों और फूलों का उत्पादन कर सकें, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सके। इसके लिए शासन स्तर पर वर्ष 2023 में ही कागजी प्रक्रियाएं शुरू कर दी गई थीं। इसके बाद 6 मार्च 2024 को योजना के क्रियान्वयन के लिए एक कार्यदायी संस्था भी नामित की गई थी, ताकि पॉलीहाउस निर्माण का काम तेजी से आगे बढ़ सके। लेकिन इसके बावजूद योजना को अपेक्षित गति नहीं मिल सकी और दो साल बीतने के बाद भी इसका बड़ा हिस्सा अधर में लटका हुआ दिखाई दे रहा है।
बताया जा रहा है कि योजना के तहत राज्य में नाबार्ड की आरआईडीएफ योजना के अंतर्गत क्लस्टर आधारित छोटे पॉलीहाउस स्थापित किए जाने थे। इसके लिए लगभग 551.05 करोड़ रुपये की स्वीकृति भी दी गई थी। इतनी बड़ी वित्तीय स्वीकृति मिलने के बावजूद योजना के क्रियान्वयन की गति बेहद धीमी रही और विभाग अभी तक निर्धारित लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंच पाया है। सूत्रों के अनुसार योजना के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी समस्या कार्यदायी संस्था के स्तर पर सामने आई। करीब दो वर्ष पहले जिस संस्था को पॉलीहाउस निर्माण का जिम्मा दिया गया था, वह अपेक्षित गति से काम नहीं कर पाई। परिणामस्वरूप विभाग की पूरी योजना प्रभावित होती चली गई और हजारों पॉलीहाउस स्थापित करने का लक्ष्य कागजों तक ही सीमित रह गया।
अब सरकार ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए पहले से नामित कार्यदायी संस्था से जिम्मेदारी वापस लेने का फैसला किया है। जानकारी के मुताबिक यह जिम्मेदारी ब्रेथवेट एंड कंपनी लिमिटेड को दी गई थी, लेकिन काम की धीमी प्रगति के कारण अब इसे हटाने का निर्णय लिया गया है। सरकार ने योजना को आगे बढ़ाने के लिए नई व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। इसके तहत अब एमपैनल्ड वेंडरों के माध्यम से पॉलीहाउस निर्माण का कार्य कराया जाएगा। साथ ही इसके लिए सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) के माध्यम से भुगतान और कार्य संचालन की प्रक्रिया अपनाने की योजना बनाई गई है, ताकि पारदर्शिता और गति दोनों सुनिश्चित की जा सके।
इस संबंध में अपर सचिव आनंद श्रीवास्तव की ओर से आदेश जारी करते हुए संबंधित विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि एक महीने के भीतर पूर्व में नामित पीएसयू से यह कार्य पूरी तरह वापस लेकर एमपैनल्ड वेंडरों के माध्यम से नई व्यवस्था लागू करने की सभी औपचारिकताएं पूरी की जाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना समय पर लागू हो पाती तो प्रदेश के हजारों किसानों को इसका सीधा लाभ मिल सकता था। पॉलीहाउस तकनीक के माध्यम से किसान कम क्षेत्र में भी अधिक उत्पादन कर सकते हैं और मौसम की अनिश्चितताओं से भी काफी हद तक बच सकते हैं। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में जहां पारंपरिक खेती की सीमाएं हैं, वहां पॉलीहाउस खेती किसानों की आय बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। अब सरकार की कोशिश है कि नई व्यवस्था के माध्यम से योजना को फिर से गति दी जाए और जल्द से जल्द अधिक से अधिक पॉलीहाउस स्थापित किए जा सकें। यदि विभाग समयबद्ध तरीके से काम आगे बढ़ाने में सफल होता है तो आने वाले वर्षों में प्रदेश के किसानों को इसका बड़ा लाभ मिल सकता है।


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